ज़िन्दगी एक जंग निकली मैं तो खेल समझा था
रेशम की गुत्थी को मैं लफ्जों का मेल समझा था
रेशम की गुत्थी को मैं लफ्जों का मेल समझा था
इश्क़ का सफ़र सब खोने या सब पा लेने का था
उड़ते उड़न खटोले को
रिश्तो की रेल समझा था
जब छोड़ कर तेरा हाथ जो हाथ मैंने थाम लिया था
उस गर्दिशे-दौरा को असीरे-जाँ तेरी जेल समझा था
खुवाहिशे-दुनिया तेरी आरज़ू को बहुत महंगा ले आये
साजिशो के बाज़ार को खुशियों की सेल समझा था
सुकून-ए-ज़ीस्त तेरे हासिल को क्या कुछ न किया
“लईक” फितना-ए-ज़िन्दगी
में तुझे फेल समझा था
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