Thursday, January 15, 2015

अहले इश्क़ का कोई मज़हब ही नहीं होता

नफरते के बागान का यह पुराना मवाद है
नया नाम अब मगर इसका लव-जेहाद है 

जुनूने-इश्क़ तो फिर किसी की नहीं सुनता
यह तो आदम से फितरतन ही आज़ाद है

क्यों पूछते हो मजनू से माबूद का नाम
उसे तो फ़क़त सहरा की खाक-गर्द याद है

अहले इश्क़ का कोई मज़हब ही नहीं होता
यह खुद अहवाल-ए-दिले-जार से बे-दाद है

मुरझा चुके है गुल कई खिलने से पहले ही
डरी सहमी हुई मुहब्बतों की यह फरियाद है

दास्ताने-दिल नाम पूछ के नही लिखी जाती
लईक यह हर धड़कते हुए दिल की रुदाद है 

ज़िन्दगी एक जंग निकली मैं तो खेल समझा था

ज़िन्दगी एक जंग निकली मैं तो खेल समझा था   
रेशम की गुत्थी को मैं लफ्जों का मेल समझा था  

इश्क़ का सफ़र सब खोने या सब पा लेने का था  
उड़ते उड़न खटोले को  रिश्तो की रेल समझा था  

जब छोड़ कर तेरा हाथ जो हाथ मैंने थाम लिया था
उस गर्दिशे-दौरा को असीरे-जाँ तेरी जेल समझा था

खुवाहिशे-दुनिया तेरी आरज़ू को बहुत महंगा ले आये
साजिशो के बाज़ार को खुशियों की सेल समझा था

सुकून-ए-ज़ीस्त तेरे हासिल को क्या कुछ न किया
लईक फितना-ए-ज़िन्दगी में तुझे फेल समझा था