रौशनी को घर मेरा अब अपना चाहिये
धुआ धुआ सा जल रहा तन- मन मेरा
लगी आग को अब तो बुझ जाना चाहिये
भीड़ तो बहुत दिखाई दे रही है मगर
इस भीड़ में चेहरा जाना पहचाना चाहिये
कहते है के मतलबी है दिखावटी है सब चेहरे
नए दोंर को फिर फलसफा पुराना चाहिये
अपना भी कब हमेशा अपना बना रहता है
चलो किसी अपने को अपना बनाना चाहिये
ऐ दोस्त मुझसे तेरा लगाव बेहतर है मगर
मुझसे बेहतर मिले उसे भी आज़माना चाहिए
ज़रूरी नहीं हर दोस्त दरे लहद तक साथ हो
इस मय्यत से तुझे अब निकल जाना चाहिये
