नफरते के बागान का यह पुराना मवाद है
नया नाम अब मगर इसका लव-जेहाद है
जुनूने-इश्क़ तो फिर किसी की नहीं सुनता
यह तो आदम से फितरतन ही आज़ाद है
क्यों पूछते हो मजनू से माबूद का नाम
उसे तो फ़क़त सहरा की खाक-गर्द याद है
अहले इश्क़ का कोई मज़हब ही नहीं होता
यह खुद अहवाल-ए-दिले-जार से बे-दाद है
मुरझा चुके है गुल कई खिलने से पहले ही
डरी सहमी हुई मुहब्बतों की यह फरियाद है
दास्ताने-दिल नाम पूछ के नही लिखी जाती
लईक यह हर धड़कते हुए दिल की रुदाद है




