Thursday, January 15, 2015

अहले इश्क़ का कोई मज़हब ही नहीं होता

नफरते के बागान का यह पुराना मवाद है
नया नाम अब मगर इसका लव-जेहाद है 

जुनूने-इश्क़ तो फिर किसी की नहीं सुनता
यह तो आदम से फितरतन ही आज़ाद है

क्यों पूछते हो मजनू से माबूद का नाम
उसे तो फ़क़त सहरा की खाक-गर्द याद है

अहले इश्क़ का कोई मज़हब ही नहीं होता
यह खुद अहवाल-ए-दिले-जार से बे-दाद है

मुरझा चुके है गुल कई खिलने से पहले ही
डरी सहमी हुई मुहब्बतों की यह फरियाद है

दास्ताने-दिल नाम पूछ के नही लिखी जाती
लईक यह हर धड़कते हुए दिल की रुदाद है 

ज़िन्दगी एक जंग निकली मैं तो खेल समझा था

ज़िन्दगी एक जंग निकली मैं तो खेल समझा था   
रेशम की गुत्थी को मैं लफ्जों का मेल समझा था  

इश्क़ का सफ़र सब खोने या सब पा लेने का था  
उड़ते उड़न खटोले को  रिश्तो की रेल समझा था  

जब छोड़ कर तेरा हाथ जो हाथ मैंने थाम लिया था
उस गर्दिशे-दौरा को असीरे-जाँ तेरी जेल समझा था

खुवाहिशे-दुनिया तेरी आरज़ू को बहुत महंगा ले आये
साजिशो के बाज़ार को खुशियों की सेल समझा था

सुकून-ए-ज़ीस्त तेरे हासिल को क्या कुछ न किया
लईक फितना-ए-ज़िन्दगी में तुझे फेल समझा था 

Sunday, June 30, 2013

रौशनी को घर मेरा अब अपना चाहिये

रौशनी को घर मेरा अब अपना चाहिये 

जितना भी अँधेरा है मिट जाना चाहिये 

धुआ धुआ सा जल रहा तन- मन  मेरा 
लगी आग को अब तो बुझ जाना चाहिये 

भीड़ तो बहुत दिखाई दे रही है मगर 
इस भीड़ में चेहरा जाना पहचाना चाहिये 

कहते है के मतलबी है दिखावटी है सब चेहरे 
नए दोंर को फिर फलसफा पुराना चाहिये 

अपना भी कब हमेशा अपना बना रहता है 
चलो किसी अपने को अपना बनाना  चाहिये  

दोस्त मुझसे तेरा लगाव बेहतर है मगर 
मुझसे बेहतर मिले उसे भी आज़माना चाहिए 

 ज़रूरी नहीं  हर दोस्त दरे लहद तक साथ हो 

इस मय्यत से तुझे अब निकल जाना चाहिये 

Tuesday, April 16, 2013

सब मंजिले सफ़र रही मुकाम न हुआ


सब मंजिले सफ़र रही मुकाम हुआ 
जब तक सफ़र जीस्त तमाम हुआ

हर एक बाम पे और नई राह खुली 
उम्र भर चलना ही मेरा काम हुआ 

डिग्रीया सब फाइल में सजी रह गयी 
इनसे रोज़ी रोटी का इन्तेजाम हुआ

हर एक फेल  फन में अलग मज़ा है 
क्यों किसी एक में  भी  दवाम हुआ

महफ़िल में बुलाया भी मेहमाने खास था 
सुबह तक प्यासे रहे नज़रे जाम हुआ 

जाने  किस वास्ते भेजा था दहर मुजजमे में 
मैं जाने क्या क्या करता रहा वह काम हुआ 

दो पल के साये बां को मंजिल समझ लिया है 
यह  एक कयाम तो हुआ पर मकाम हुआ  

Wednesday, December 26, 2012

 बस यही एक गिला है
 रहमतो का सिलसिला है

इतने इनाम अता किये
दिल बस एक मिला है

जब चाहे कासिद  भेज दे
मेरा दर हमेशा खुला है

आने में बस ज़रा देर  कर दी
आँख खुली है अभी दम निकला है 

क्यों यकीन नहीं करते "ल ई क
 बस मुहब्बतों से फासला है



Friday, October 5, 2012


बचपन की न समझ शरारतो को  इकट्ठा करते है
जदीद तल्खियो को  उन यादो से मीठा करते है

वोह जगह के जहा पर कुछ समझने की सलाहत आयी थी
चलो फिर वही पर कुछ और नए दोस्त इकट्ठा करते है

स्कूल की दीवार से सटी उन झर्डियो के पीछे
ऊल जलूल हरकते शोर शराबा  हसी ठट्ठा करते है

वहा से जुडी तुम्हारे साथ हमारी कुछ यादे भी है
नीली आँख गुलाबी गाल काताला के लिए झगडा करते है

वह नदी का किनारा जहा नहाते हुए हम अक्सर झगडे थे
जम चुकी उन यादो के दही का  मथ कर मठ्ठा करते है

वह नदी का किनारा जहा नहाते हुए हम अक्सर झगडे थे
जम चुकी उन यादो के दही का  मथ कर मठ्ठा करते है

एक दोस्त जो हम से कुछ तगड़ा कुछ मोटा था
चलो दोस्त हम दोनों मिलकर उससे लंठआ करते है

Friday, August 31, 2012




naye naye rishto main bandhta ja raha ho main
bandhe bandhaye rishto se tootta ja raha ho main

her ek khushi se bhagna meri fitrat thee
aur aaj har gham ko apnata ja raha ho main

tamaam ulghane ek pal mein tamaam hoti hai
yeh kin ulghano mein ulgha ja raha ho main

waha ujar gai kisi apne ki dunia aaj
yaha khatito khatir jamata ja raha ho main

wakt ka masiha ab apna kaam karega
kyo khule zakhmo ko dhake ja raha ho main

tum bhi apna falsafa teh rakho "laique"
kon kisi ka hai kis ka hota ja raha ho main

Laique ahmad ansari