Sunday, June 30, 2013

रौशनी को घर मेरा अब अपना चाहिये

रौशनी को घर मेरा अब अपना चाहिये 

जितना भी अँधेरा है मिट जाना चाहिये 

धुआ धुआ सा जल रहा तन- मन  मेरा 
लगी आग को अब तो बुझ जाना चाहिये 

भीड़ तो बहुत दिखाई दे रही है मगर 
इस भीड़ में चेहरा जाना पहचाना चाहिये 

कहते है के मतलबी है दिखावटी है सब चेहरे 
नए दोंर को फिर फलसफा पुराना चाहिये 

अपना भी कब हमेशा अपना बना रहता है 
चलो किसी अपने को अपना बनाना  चाहिये  

दोस्त मुझसे तेरा लगाव बेहतर है मगर 
मुझसे बेहतर मिले उसे भी आज़माना चाहिए 

 ज़रूरी नहीं  हर दोस्त दरे लहद तक साथ हो 

इस मय्यत से तुझे अब निकल जाना चाहिये 

Tuesday, April 16, 2013

सब मंजिले सफ़र रही मुकाम न हुआ


सब मंजिले सफ़र रही मुकाम हुआ 
जब तक सफ़र जीस्त तमाम हुआ

हर एक बाम पे और नई राह खुली 
उम्र भर चलना ही मेरा काम हुआ 

डिग्रीया सब फाइल में सजी रह गयी 
इनसे रोज़ी रोटी का इन्तेजाम हुआ

हर एक फेल  फन में अलग मज़ा है 
क्यों किसी एक में  भी  दवाम हुआ

महफ़िल में बुलाया भी मेहमाने खास था 
सुबह तक प्यासे रहे नज़रे जाम हुआ 

जाने  किस वास्ते भेजा था दहर मुजजमे में 
मैं जाने क्या क्या करता रहा वह काम हुआ 

दो पल के साये बां को मंजिल समझ लिया है 
यह  एक कयाम तो हुआ पर मकाम हुआ