Wednesday, December 26, 2012

 बस यही एक गिला है
 रहमतो का सिलसिला है

इतने इनाम अता किये
दिल बस एक मिला है

जब चाहे कासिद  भेज दे
मेरा दर हमेशा खुला है

आने में बस ज़रा देर  कर दी
आँख खुली है अभी दम निकला है 

क्यों यकीन नहीं करते "ल ई क
 बस मुहब्बतों से फासला है



Friday, October 5, 2012


बचपन की न समझ शरारतो को  इकट्ठा करते है
जदीद तल्खियो को  उन यादो से मीठा करते है

वोह जगह के जहा पर कुछ समझने की सलाहत आयी थी
चलो फिर वही पर कुछ और नए दोस्त इकट्ठा करते है

स्कूल की दीवार से सटी उन झर्डियो के पीछे
ऊल जलूल हरकते शोर शराबा  हसी ठट्ठा करते है

वहा से जुडी तुम्हारे साथ हमारी कुछ यादे भी है
नीली आँख गुलाबी गाल काताला के लिए झगडा करते है

वह नदी का किनारा जहा नहाते हुए हम अक्सर झगडे थे
जम चुकी उन यादो के दही का  मथ कर मठ्ठा करते है

वह नदी का किनारा जहा नहाते हुए हम अक्सर झगडे थे
जम चुकी उन यादो के दही का  मथ कर मठ्ठा करते है

एक दोस्त जो हम से कुछ तगड़ा कुछ मोटा था
चलो दोस्त हम दोनों मिलकर उससे लंठआ करते है

Friday, August 31, 2012




naye naye rishto main bandhta ja raha ho main
bandhe bandhaye rishto se tootta ja raha ho main

her ek khushi se bhagna meri fitrat thee
aur aaj har gham ko apnata ja raha ho main

tamaam ulghane ek pal mein tamaam hoti hai
yeh kin ulghano mein ulgha ja raha ho main

waha ujar gai kisi apne ki dunia aaj
yaha khatito khatir jamata ja raha ho main

wakt ka masiha ab apna kaam karega
kyo khule zakhmo ko dhake ja raha ho main

tum bhi apna falsafa teh rakho "laique"
kon kisi ka hai kis ka hota ja raha ho main

Laique ahmad ansari


Thursday, August 16, 2012

Ghazal on Eid




हर सुबह एक नयी आज़माइश है 
दुनिया जैसे दुखो की नुमाइश है 

मैं सुनाने बैठा था रुदादे दिल
कहते है यह तो खुद सताइश  है 

अच्छी लगी शायद मेरी गिरायागीरी 
आज फिर उसी की फरमाइश है 

जिस की आमद पे मैं उदास था 
आज वही मेरे घर की आराइश है

इस दोरे जदीद में औलाद को नसीहत 
तोबा करो यह कलयुग की पैदाइश है  

    आ जाते के नज़र भी धुंधला गयी है 
    वक्ते रुखसत मिलने की गुज़ारिश है 

Monday, August 13, 2012



attribute to John elia

Ek beqarari si beqarari Hai
dil ajab Hai apne aap bhari Hai
tum koan ho aur main kuan
khamuka ki bahas jaari Hai
aane to do hashr ka din yaro
dekhege koan Kis pe bhari Hai
jo chala gaya use rona chor do
aaj uski to kal hamari bari Hai
muzaffar yakta dost Hai to kiya
yeh das Mashkoor pe bhari
 Hai zakm bharne pe 'laique' ke to
Ab agyaar ke nakhoo barne ki bari hai
Laique Ahmad Ansari