सब मंजिले सफ़र रही मुकाम न हुआ
जब तक सफ़र ऐ जीस्त तमाम न हुआ
हर एक बाम पे और नई राह खुली
उम्र भर चलना ही मेरा काम हुआ
डिग्रीया सब फाइल में सजी रह गयी
इनसे रोज़ी रोटी का इन्तेजाम न हुआ
हर एक फेल ओ फन में अलग मज़ा है
क्यों किसी एक में भी दवाम न हुआ
महफ़िल में बुलाया भी मेहमाने खास था
सुबह तक प्यासे रहे नज़रे जाम न हुआ
जाने किस वास्ते भेजा था दहर ऐ मुजजमे में
मैं जाने क्या क्या करता रहा वह काम न हुआ
दो पल के साये बां को मंजिल समझ लिया है
यह एक कयाम तो हुआ पर मकाम न हुआ
