Thursday, August 16, 2012

Ghazal on Eid




हर सुबह एक नयी आज़माइश है 
दुनिया जैसे दुखो की नुमाइश है 

मैं सुनाने बैठा था रुदादे दिल
कहते है यह तो खुद सताइश  है 

अच्छी लगी शायद मेरी गिरायागीरी 
आज फिर उसी की फरमाइश है 

जिस की आमद पे मैं उदास था 
आज वही मेरे घर की आराइश है

इस दोरे जदीद में औलाद को नसीहत 
तोबा करो यह कलयुग की पैदाइश है  

    आ जाते के नज़र भी धुंधला गयी है 
    वक्ते रुखसत मिलने की गुज़ारिश है 


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