हर सुबह एक नयी आज़माइश है
दुनिया जैसे दुखो की नुमाइश है
मैं सुनाने बैठा था रुदादे दिल
कहते है यह तो खुद सताइश है
अच्छी लगी शायद मेरी गिरायागीरी
आज फिर उसी की फरमाइश है
जिस की आमद पे मैं उदास था
आज वही मेरे घर की आराइश है
इस दोरे जदीद में औलाद को नसीहत ॽ
तोबा करो यह कलयुग की पैदाइश है
आ जाते के नज़र भी धुंधला गयी है
वक्ते रुखसत मिलने की गुज़ारिश है

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